माही v/s प्रिन्स

माही v/s प्रिन्स

इस कविता से मैं खुदा से उन मासूमो के गुनहगारो को सज़ा देने की फ़रियाद करता हूँ ,

वसुंधरा की गोद में , कितने मासूम सो गये |

रह गया आँगन ये सूना , बिन कफ़न के जो गये ||

दोष क्या था उनका , मासूम सी वो जान थी |
भूतल पर गड्डा मौत का , जान वो अनजान थी ||

जन्म दिवस मना रहा था , कोई गाना गा रहा था |
देखते ह़ी देखते , कोई मौत को बुला रहा था ||

आज मेरा वार था , ख़ुशी का वो त्यौहार था |
सब चले गये थे घर को , किसीको मेरा इंतजार था ||

उस रात की वो बात थी , कदम कदम पर मौत थी |
खुद से मैं यूँ लड़ पड़ी , क्यों कुएं में फिसल पड़ी ||

कोई खींचता चला गया , वो रास्ता अजीब था |
कोई हाथ न पकड़ सका , येही मेरा नसीब था ||

एक आवाज मेरी थी , वो मुझको ह़ी पुकारती |
गड़ गयी खड़ी खड़ी , मैं आंसमां निहारती ||

दम निकल रहा था मेरा , मन मचल रहा था मेरा |
सिस्कियों की मौत थी , बदन भी जल रहा था मेरा ||

आखरी सलाम कर , उस हिचकी ने सुला दिया |
मोती मेरा गिर सका न , कितनो को रुला दिया ||

प्रिंस कोई बन गया, प्रिंसेस मैं न बन सकी |
मात कोई दे गया , मैं मौत से न लड़ सकी ||

दर्जनों की मौत का जिम्मेदार कौन है ?
मासूमो की मासूमियत का हत्यारा कौन है ?

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